गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात्‌ परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

श्लोक

विद्वत्त्वं दक्षता शीलं सङ्कान्तिरनुशीलनम् । शिक्षकस्य गुणाः सप्त सचेतस्त्वं प्रसन्नता ॥

श्लोक

विद्वत्व, दक्षता, शील, संक्रांति, अनुशीलन, सचेतत्व, और प्रसन्नता – ये सात शिक्षक के गुण हैं

अर्थ 

दुग्धेन धेनुः कुसुमेन वल्ली शीलेन भार्या कमलेन तोयम् । गुरुं विना भाति न चैव शिष्यः शमेन विद्या नगरी जनेन ॥

श्लोक

शिष्य और गुरु के संबंध को दुग्ध और धेनु, कुसुम और वल्ली, शील और भार्या, कमल और तोय के समान दर्शाता है। शिष्य के लिए गुरु ही उसके  ज्ञान का स्रोत होते हैं, और बिना गुरु के, विद्या के नगर में जाने का योग्य रास्ता नहीं होता।

अर्थ 

गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट। अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट॥

दोहा

गुरु ही शिष्य के चरित्र का निर्माण करता है, गुरु के अभाव में शिष्य एक माटी का टुकड़ा ही होता है जिसे गुरु एक घड़े का आकार देते हैं, उसके चरित्र का निर्माण करते हैं।

अर्थ 

गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान। तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान॥

दोहा

संपूर्ण संसार में गुरु के समान कोई दानी नहीं है और शिष्य के समान कोई याचक नहीं है। ज्ञान रुपी अमृतमयी अनमोल संपती गुरु अपने शिष्य को प्रदान करके कृतार्थ करता है और गुरु द्वारा प्रदान कि जाने वाली अनमोल ज्ञान सुधा केवळ याचना करके ही शिष्य पा लेता है।

अर्थ 

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलें न मोष । गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष ॥

दोहा

गुरु के बिना ज्ञान नहीं पैदा होता, गुरु के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु के बिना लिखे कोई भी सत्य का साक्षात्कार नहीं कर सकता और गुरु के बिना कोई भी दोष नहीं मिटता ।

अर्थ